Wednesday, 14 September 2011

हमसफर

हमसफर


वक्‍त ने दिया उछाल, फिर इक सवाल, मासूम सा, जानिब मेरी।
के इल्‍म है, उसे आरजू का मेरी, चले वो दम ब दम हर कदम साथ मेरे।
पर गुजर गया इक बार जो वो राह गुजर से मेरी।
देख लूं कितना ही मुड़ के, न लोट आएगा फिर कभी वो राह मेरी।
गैर मुमकिन है जो, वो क्‍यों कर मुमकिन हो सके, सिर्फ मेरे लिए।
कहा मैने ए वक्‍त, गुजर तो मैं भी जाउगां,
लम्‍हा लम्‍हा कदम ब कदम चलते साथ तेरे
मगर लिख जाउगां इबारत कुछ ऐसी, अपने आमाल की,
हौसलों की कलम से, कोरे पन्‍नो पे तेरे।
के आईन्‍दा की तारीख के, हर दौर मे जब भी कभी कहीं जिक्र हो,
तेरे इस दौरे जमां का, तो चर्चा अपना भी शुमार संगे यार हो।।

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