Wednesday, 14 September 2011

संसार मे भागे फिरते हो, संसार से तुम क्‍या पाओगे।
जब खुद के ही तुम हो न सके, संसार को क्‍या अपनाओगे।।1।।
तुम बाहर भागे फिरते हो, हम भीतर बड़ते जाते हैं।
तुम खुद को ढूडं न पाते हो, हम खुद मे खोते जाते हैं 2।।
जो बाहर है खो जाएगा, जो भीतर है, रह पाएगा।
तुम भीड़ बड़ाते जाते हो, उस भीड़ मे तुम खो जाओगे3।।
जब भीड़ भी ये खो जाएगी, मन आंगन सूना हो जाएगा।
जो दूर रहे खुद खुद से तुम, संसार भी न तुम पाओगे4।।
अपना कर तुम खुद को देखो, संसार तेरा हो जाएगा।
खुद को खोकर खुद को पाना, यहां जीवन अमर निरन्‍तर है।।5।।
इस बात को गर तुम समझ सको, तुम भीतर अपने आ जाना।
बस भीतर अपने आ जाना, तुम भीतर अपने आ जाना।।6।।

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