बलिदानों की परम्परा विस्मृत जो तुमने कर डाली है।
येन केन प्रकरेण जीवन जीने की शैली तुमने अपना ली है।।
शोषित पीड़ित और अपमानित होकर अवसादों
में हो जीते जाते।
प्रितिपल प्रतिक्षण जीते मर मर और उस मरने से हो तुम घबराते।।
वर्षों जीते तिल तिल मर मर कुछ क्षण जीवन जीलो जी भर।
जीवन इस जग में है उसने जाना जिसने जाना जीना मरकर ।।
वो पाश लिए पीछा करती तुम प्राण लिये भागा करते।
वो मोहिनी बन छेड़े जो अलाप तुम सुध बुध खो सब सो जाते।।
है अटल सत्य यदि मृत्यु तुम्हारी उस प्राण प्रिय से क्यों घबराना।
इक श्वाश का है खेल सभी जग अपना है न बेगाना।।
जीवन का जो तुम मर्म यह जानो मृत्यु को यदि तुम अंत न मानो।
ये दृश्य जो है सब मिट जाएगा जो अमिट रहे उसको पहचानो।।
फिर आँखों में तुम आँख डालकर हाथ मृत्यु का हाथ में ले लो।
वो संग तुम्हारे चले निरंतर बन संगी साथी संग हो डोलो ।।
भय मुक्त हो बिना त्रास के हर क्षण जीवन जी जाओगे।
अदम्य साहस पुरुषार्थ प्रखर हो कुछ ऐसा तुम कर जाओगे।।
जगती का कल्याण करोगे माँ भारती का सम्बल बन जाओगे।
तन मन धन का कर समर्पण मातृ ऋण से उऋण हो जाओगे।।
जीवन के रहे उस पार भी जीवन हर मन आँगन तुम बस जाओगे।
जीवन अर्पण कर प्रस्थान करो जब तुम देव स्वरुप हो जाओगे।।
यह देश धन्य और धरा धन्य जग गीत तुम्हारे गायेगा।
मृत्यु रहेगी चिर ऋणी तुम्हारी जीवन कृतार्थ हो जाएगा।।। विजयन